साहित्य समाज की जड़ों को सींचता है: समीर माथुर

Card image admin नई दिल्ली | Published on: Thursday, November 19th, 2020
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साहित्य समाज की जड़ों को सींचता है: समीर माथुर

– हरियाणा साहित्य अकादमी की पहल पर आयोजित वेबिनार में देशभर से साहित्यकारों ने लिया हिस्सा

चंडीगढ़/पंचकुला। ऊर्जा संरक्षण दिवस के अवसर पर संचालित ऊर्जा संरक्षण अभियान में आज हरियाणा साहित्य अकादमी की पहल पर प्रकृति संरक्षण में अमर रचनाकार जगदीशचंद्र माथुर के साहित्य का योगदान को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार डाॅ. विरेन्द्र मेहंदीरत्ता ने कहा कि प्रकृति के अस्मिता का वर्णन कोणार्क में जीवंत तरीके से किया गया है।

कोणार्क के संवाद का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि झुरमुट की ओट में बैठी हुई चिड़िया की चहचहाहट सुख का ही नहीं दुख का बयान भी हो सकती है जिसका आशय है कि लेखक समस्त प्राणी जगत के प्रति संवेदनशील होता है। उन्होंने कहा कि पहला राजा, भोर का तारा, शरदीया रीढ़ की हड्डी जैसे एकांकी और नाटक समाज की विसंगतियों को चिन्हित करते हैं तो वहीं समाज की रूढ़ियों को खत्म करने की कोशिश भी करते हैं। हरियाणा काडर के अवकाश प्राप्त आई.ए.एस. एवं पूर्व गृह सचिव श्री समीर माथुर ने कहा कि मैं उनका पुत्र होने के बाद यह महसूस करता हूं कि समाज का एक बड़ा वर्ग हमसे ज्यादा हमारे पिता श्री जगदीशचंद्र माथुर को ज्यादा अपना मानता है। उन्होंने एक स्मृति को संदर्भित करते हुए कहा कि एक बार हरिवंशराय बच्चन अपने पुत्र अमिताभ बच्चन को लेकर घर आए थे और अमिताभ ने संगीत प्रस्तुति में हिस्सा लिया था। भविष्य में आगे चलकर साहित्य का संस्कार अमिताभ बच्चन को कला प्रस्तुति का नायक बना दिया। उन्होंने कहा कि जगदीशचंद्र माथुर सौंदर्य बोध के दर्शन के अभिलाषी रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में सुन्दर चीजों का साक्षात दर्शन होता है। प्रकृति के सौंदर्य को निहारने के प्रेरक व्यक्तित्व थे।

विमर्श के आरंभ में साहित्य अकादमी के निदेशक डाॅ. चन्द्रत्रिखा ने स्वागत करते हुए कहा कि आज के विमर्श में जगदीशचंद्र माथुर की स्मृति को समर्पित विमर्श में हरियाणा के सभी महाविद्यालयों के प्राचार्यों, शिक्षकों एवं साहित्यसुधी नागरिकों की हिस्सेदारी हरियाणा के साहित्यिक समाज का जीवंत दर्शन करा रहा है। उन्होंने जगदीशचद्र माथुर से अपनी सहृदय मुलाकातों का संस्मरण भी सुनाया। विमर्श में विशेष रूप से हिस्सा लेते हुए पंजाब विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के प्रोफेसर डाॅ. गुरमीत सिंह ने कहा कि उनका एक विचार हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा कि भारतीय लोकतंत्र हिन्दी और भारतीय भाषाओं से ही चलेगा। उन्होंने कहा कि आल इंडिया रेडियो का हिन्दी नामकरण आकाशवाणी श्री जगदीशचंद्र माथुर ने ही किया था जिससे यह संदेश जाता है कि भाषाओं में अनुवाद कार्य शब्दों की शब्दशः अर्थ ध्वनियों के ख्याल के साथ-साथ भावानुवाद भी किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि उनकी पुस्तक बहुजन संप्रेषण भारत की हिन्दी पत्रकारिता की आधार पुस्तक है। उन्होंने बताया कि आजादी के आरम्भिक दशक में प्रौढ़ शिक्षा, शिक्षा नीत, संस्कृति नीत, सांस्कृतिक संस्थाओं का निर्माण उनके जीवन की प्राथमिकता रही है। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए जनसंपर्क अधिकारी एवं संस्कृतकर्मी राजीव रंजन ने कहा कि जगदीशचंद्र माथुर भारतीय चिंतन धारा के ऐसे साहित्य निर्माता हैं जिन्होंने अपने समय के बड़े साहित्यकारों को आकाशवाणी से ही नहीं जोड़ा बल्कि अपने समय के लोक नायक भोजपुरी के भिखारी ठाकुर, हरियाणवी के लख्मीचंद जैसे हृदय सम्राट लोक कलाकारों को मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति वर्णन के ऐसे रचनाकारों की कृतियां जलवायु परिवर्तन के दौर में नई पीढ़ी को पर्यावरण प्रहरी बनने का मार्ग दिखाएंगी। यह वेबिनार श्रृंखला 14 दिसम्बर तक जारी है। 07 से 14 दिसंबर को प्रतिदिन समाज के सभी वर्गों के साथ वेबिनार के माध्यम से विमर्श आयोजित किया जाएगा जिसमें ए.सी.एस पाॅवर, चेयरमैन वितरण कंपनी, प्रबंध निदेशक एवं निदेशक रूबरू होंगे। इस विमर्श मेें डा. अनुपम अरोड़ा प्रचार्य एस. डी. पी. जी कालेज पानीपत, डा. राजेन्द्र प्रसाद प्राचार्य एस. डी. पी. जी कालेज, अम्बाला, डा. आर. पी सैनी प्राचार्य डी. ए. वी. कालेज करनाल, डा. रेखा शर्मा प्राचार्य राजकीय महाविद्यालय करनाल, डा. चन्द्रशेखर प्राचार्य दयाल सिंह करनाल अतिरिक्त पुलिस पब्लिक स्कूल एवं विविध शिक्षक प्राचार्य ने हिस्सा लिया।

कौन है श्री जगदीशचंद्र माथुर
जन्म – 16 जुलाई, 1917
1940 में आई.सी.एस
शिक्षा – खुर्जा बुलंदशहर, इलाहाबाद
विवाह – 29 नवंबर, 1944
मृत्यु – 14 मई, 1978
प्रख्यात कृतियां – दस तस्वीरें, कोणार्क, पहला राजा, भोर का तारा, बहुजन संप्रेषण, बोलते क्षण, जिन्होंने जीना जाना, ओ मेरे सपने, कुवर सिंह की टेक, गगन सवारी, शरदिया, दशरथ नंदन, रघुकुल रीत, परंपराशील नाट्य।


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