नास्तिक केंद्र वाले गोरा से बापू का क्या संबंध था

Card image admin नई दिल्ली | Published on: Friday, October 2nd, 2020
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नास्तिक केंद्र वाले गोरा से बापू का क्या संबंध था

गांधी

गांधी धार्मिक मान्यताओं पर भरोसा किया करते थे हालांकि उसी दौरान वे सांप्रदायिक सद्भाव को भी बढ़ावा देने की हरसंभव कोशिश करते. इतिहास से मालूम होता है कि महात्मा गांधी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और विश्वास वाले लोगों से लगातार संवाद किया करते थे.

यह जानना दिलचस्प है कि गांधी ने सेवाग्राम स्थित अपने आश्रम में आने का न्योता गोपाराजू रामचंद्र राव को भी दिया था, जो एक नास्तिक थे और उन्होंने एक नास्तिक केंद्र की स्थापना की थी. गोपाराजू रामचंद्र ही गोरा के नाम से जाने जाते हैं. गांधी अपने आश्रम सेवाग्राम में गोरा के साथ लंबी चर्चा किया करते थे. यहां यह भी जानना दिलचस्प है कि गोरा अपने परिवार के साथ सेवाग्राम में दो साल तक रहे थे.

गोरा के फ़ॉलोअर्स की मानें तो गांधी के साथ उनके रिश्तों की शुरुआत स्वतंत्रता मिलने से पहले हो गई थी और गोरा पर गांधी का प्रभाव नज़र आता था. एक तरफ़ धार्मिक विश्वास पर भरोसा रखने वाले गांधी और दूसरी तरफ़ नास्तिक गोरा, लेकिन दोनों के आपसी संबंधों की झलक आज भी विजयवाड़ा स्थित नास्तिक केंद्र में लगी प्रदर्शनी ‘बापू दर्शन’ से मिलती है. ऐसे में गोरा कौन थे और उन पर गांधी का कितना असर था, ये जानना दिलचस्प है.

ओडिशा से श्रीलंका तक गोरा का सफ़र

गोरा का पूरा नाम गोपाराजू रामचंद्र राव था. उनका जन्म 15 नवंबर, 1902 को ओडिशा के गंजाम ज़िले के छत्रपुरी में हुआ था. उन्होंने परलाकिमिडी और काकिनाडा में शिक्षा हासिल की है. इसके बाद उन्होंने वनस्पति विज्ञान में चेन्नई के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की. बाद में वे वनस्पति विज्ञान के ही लेक्चरर बन गए. इसके बाद उन्होंने मदुरई, कोयम्बटूर और कोलंबो तक जाकर पढ़ाया. फिर विजयवाड़ा में जब यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई तब सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बुलाने पर वे कृष्णा नदी के किनारे बनी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने आ गए.

गांधी

यहाँ आने के बाद ही उन्होंने झूठी मान्यताओं और विश्वासों के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू की. 1930 में उन्होंने ग्रहण के दिनों को लेकर बुरे प्रभावों से जुड़ी आस्था को मिटाने की कोशिश शुरू की, इसके लिए वे अपनी पत्नी के साथ ग्रहण के वक़्त भोजन करने लगे, इस दौरान पत्नी के गर्भवती होने पर वे उन्हें लेकर बाहर निकलने लगे. उन्होंने लोगों में फैले अंधविश्वास को दूर करने के लिए ईमानदारी से काम किया.

गोरा के नास्तिक केंद्र के 80 साल

उन्होंने आज़ादी मिलने से पहले ही लोगों में नास्तिक विचारधारा को लोकप्रिय बनाने का काम शुरू कर दिया था. इसके लिए उन्होंने कृष्णा ज़िले में 10 अगस्त, 1940 को एक नास्तिक केंद्र की स्थापना की थी. वैसे तो यह भारत में बना पहला नास्तिक केंद्र था लेकिन लोगों का मानना है कि यह दुनिया में भी अपनी तरह का इकलौता केंद्र है.

गांधी

उन्होंने 80 युवाओं के साथ नास्तिकता को लेकर अभियान चलाया जिसमें शिक्षा को लेकर काफ़ी ज़ोर दिया गया. इसके अलावा उन्होंने उस वक़्त जातिगत आधार पर फैले छुआछूत को भी कम करने का काम किया. इसके लिए आसपास के गांवों में सामुदायिक भोज का आयोजन किया करते थे. आज़ादी मिलने से थोड़े ही समय पहले अप्रैल, 1947 में उन्होंने अपने केंद्र को विजयवाड़ा शिफ़्ट कर दिया.

गोरा के बाद उनके फ़ॉलोअर और परिवार वाले इस केंद्र को चलाते रहे जो विजयवाड़ा के बेंज सर्किल के पास स्थित है. समय-समय पर बैठकें और सेमिनार का सिलसिला जारी है जबकि लाइब्रेरी जैसी सुविधाएं भी है. आर्थिक समता मंडल लोगों में आर्थिक जागरूकता के लिए अभियान भी चलाता है.

नास्तिक केंद्र ने हाल ही में अपने 80 साल पूरे किए. मौजूदा समय में वहां दो प्रदर्शनियां चल रही हैं- एक है बापू दर्शन, दूसरा गोरा और उनकी पत्नी सरस्वती गोरा के कामों पर आधारित. केंद्र में गोरा साइंस सेंटर भी है. जबकि यहां की लाइब्रेरी में भारत और दुनिया की तमाम शख़्सियतों की लिखीं किताबें मौजूद हैं.

गांधी ने की थी गोरा के काम की प्रशंसा

गोरा सामाजिक असमानता को दूर करना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए लगातार काम किया. उन्होंने दलितों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए भी काम शुरू किया, ठीक उसी वक़्त गांधी ने भी छुआछूत दूर करने का आह्वान किया था. गोरा के कामों की जानकारी गांधी तक पहुँच रही थी और यही वजह है कि गांधी ने गोरा को अपने आश्रम आने का निमंत्रण भेजा, जिसके बाद गोरा सेवाग्राम पहुँचे थे.

गांधी

गांधी और गोरा के बीच लंबी वार्ता हुआ करती थी. गोरा के बेटे नियंता ने बीबीसी को बताया कि दोनों के बीच आस्था और नास्तिकता के कॉन्सेप्ट पर तो चर्चा होती ही थी, इसके अलावा वे उस वक़्त की सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा किया करते थे. इन चर्चाओं में भारत छोड़ो आंदोलन, राष्ट्र का पुनर्निर्माण जैसे मुद्दे भी शामिल थे. नियंता के मुताबिक़ चूंकि पूरा परिवार ही सेवाश्रम में था लिहाज़ा छोटे-छोटे बच्चों से गांधी घुलमिल गए थे.

अपने अनुभवों के बारे में उन्होंने बताया, “आश्रम में हर कोई अपनी क्षमता के मुताबिक़ कुछ ना कुछ काम करता था. मैं काफ़ी छोटा था. मेरे बड़े भाई और दूसरे लोग फल और सब्ज़ियों को धोने का काम कर रहे थे, तब गांधी जी वहीं आए थे. उन्होंने मेरे बड़े भाई को कहा कि कुछ फल खा लो, तब मेरे बड़े भाई ने कहा था, ‘हम लोग इसे धोकर वहां रखेंगे, इसके बाद सबको बराबर हिस्सों में बांटेंगे.’ यह सुनकर गांधी जी काफ़ी प्रसन्न हुए. उन्होंने कहा था कि ऐसे युवाओं के होने से देश में नाकारात्मक प्रवृति नहीं आएगी कि लोग दूसरों की चिंता किए बिना आवश्यक वस्तुओं पर क़ाबिज़ हो जाएंगे.”

नियंता ने गांधी से जुड़े अनुभवों की चर्चा करते हुए कहा, “हम सब उस घटना को याद करते रहे. इसके अलावा भी कई यादें हैं. वे हमारे बड़े भाई की शादी में भी आने वाले थे. बड़े भाई की शादी मार्च, 1948 में होने वाली थी लेकिन उनकी हत्या जनवरी में हो गई. तब उनकी ग़ैर-मौजूदगी में ही हमारे परिवार में ग़ैर-दलित की शादी दलित से हुई थी. शादी में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सहित दूसरे लोग थे. एक दिन तीन शादियां हुई थीं. तेलुगू समाज की पहली तीन अंतरजातीय शादियां. दो मेरे बड़े भाई, एक मेरी बड़ी बहन की शादी हुई थी.”

गांधी

गोरा गांधी के काम को बढ़ाते रहे

गोरा के साथ काम कर चुके पी. रामा राव के मुताबिक़ गोरा भले नास्तिक विचारधारा के साथ काम कर रहे थे लेकिन उन पर गांधी का असर था. उन्होंने बीबीसी को बताया, “गोरा अपनी बातों में कभी ये नहीं कहते थे कि ईश्वर नहीं है या शैतान नहीं है. वे किसी नतीजे पर पहुँचने वाली बात नहीं कहते थे. वे लोगों से कहते थे कि विकास के लिए, समानता के लिए नास्तिक तरीक़े से सोचना समझना चाहिए. उन्होंने इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था और इसके ज़रिए वे गांधी जी के आदर्शों को हासिल करने की कोशिश कर रहे थे.”

“उनकी नास्तिकता के केंद्र में ईमानदारी और इंसानियत का पहलू शामिल था. वे तर्क के साथ सोचने की बात कहते थे. उन्होंने कुछ ही लोगों के साथ अपने केंद्र की शुरुआत की थी लेकिन यह व्यापाक समाज तक पहुँच बनाने में कामयाब रहा. इस देश में ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में हमारे सदस्य है. गोरा ने इसके साथ साथ अंतरजातीय विवाह के लिए काम किया, सामाजिक बुराईयों के ख़िलाफ़ मुहिम चलायी. उन्होंने लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए सेवाग्राम से दिल्ली तक की पदयात्रा भी की थी. यह सब दर्शाता है कि उन पर गांधी जी का कितना असर था.”

गांधी, गोरा

गोरा के परिवार के नामों की ख़ासियतें

गोरा स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में शामिल हुए और सामाजिक मुद्दों पर काम करते रहे. इसके साथ ही उन्होंने कई सामाजिक मुद्दों पर किताबें भी लिखीं. गोरा और उनकी पत्नी सरस्वती ने अपने पूरे जीवन को इन्हीं उद्देश्यों के लिए समर्पित कर दिया था. इनके नौ बच्चे हुए और इन सबके नाम भी बेहद ख़ास रखे गए.

जब श्रीलंका में थे तब बेटी हुई और उनका नाम रखा गया मनोरमा. नमक आंदोलन के समय बेटा हुआ तो उसका नाम रखा लावण्यम. गांधी और इरविन के बीच हुए समझौते के वक़्त बेटी हुई तो नाम रखा गया मैत्री, एक अन्य बेटी का नाम विद्या रखा गया. एक बेटा का जन्म तब हुआ जब भारतीयों को चुनाव में लड़ने का अधिकार मिला तो उसका नाम विजयम रखा गया. दूसरे विश्वयुद्ध के वक़्त हुए बेटे का नाम उन्होंने समरम रखा. आठवें बेटे का नाम तानाशाही भरे नेताओं को देखते हुए नियंता रखा गया और नौवीं बेटी का नाम नव रखा. गोरा बच्चों के नाम रखने में भी प्रयोगों को हिमायती थे.

गोरा

अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा

गोरा ने समाज में छुआछूत को दूर करने के लिए अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा दिया. उसे अपने परिवार में भी अपनाया. उन्होंने अपने बच्चों को दलितों और ग़ैर-दलितों से शादी करने को प्रेरित किया. अपनी बेटी मनोरमा का विवाह उन्होंने अर्जुन राव से किया था, यह शादी गांधी के आश्रम सेवाग्राम में हुई थी.

गोरा के बाद उनके नास्तिक आंदोलन को जारी रखने वाले बेटे लावण्यम की शादी उन्होंने दलित तेलुगू कवि गोरम जोशुआ की बेटी हेमलता से की. गोरा की बेटी नव ने बीबीसी को बताया, “गोरा के फ़ॉलोअर के तौर पर हम जाति और धर्म से ऊपर उठकर सोचते हैं. ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. दुनिया भर के दूसरे देशों में मानवीयता को तरजीह देने वाले लोगों की संख्या 50 फ़ीसद से ऊपर हो गई है. यह और बढ़ेगी.”

परिवार ने जारी रखी है परंपरा

गोरा के बाद उनकी पत्नी सरस्वती और उनके बाद बेटे लावण्यम ने उन परंपराओं को जारी रखा है. गोरा के समय में ही विजयवाड़ा के केंद्र में नास्तिकों के वर्ल्ड कांफ्रेंस का आयोजन हुआ था. ऐसा पहला आयोजन 1972 में हुआ था. इसके बाद दूसरा आयोजन गोरा के निधन के क़रीब पाँच साल बाद 1980 में हुआ था.

सरस्वती गोरा के किए काम

गोरा की पत्नी सरस्वती ने महिलाओं के विकास के लिए कई काम किए. गोरा के साथ प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हुए वे कई बार गिरफ़्तार हुईं. कई बार जेल गईं. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे ढाई साल के बेटे नियंता के साथ जेल में रहीं. उन्होंने अंध विश्वासों को दूर करने के अलाव समाज से देवदासी और जोगिनी की प्रथा को मिटाने के लिए भी कोशिशें कीं.

उन्होंने अपने जीवन में कभी आभूषण नहीं पहना क्योंकि उनका मानना था कि आभूषण धार्मिक आस्था और मान्यताओं से जुड़े हैं. उन्होंने हमेशा हाथ से बनी सूती साड़ी का इस्तमाल किया. गोरा का निधन 26 जुलाई, 1975 को हुआ था जबकि सरस्वती का निधन 19 अगस्त, 2006 को हुआ. उन्होंने महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता दिलाने के लिए 1969 में एक महिला मंडल की शुरुआत की. इस संस्था ने महिलाओं के लिए कई तरह की ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाए.

इन कार्यक्रमों के बारे में डॉ. कीर्ति ने बीबीसी को बताया, “हिंसा का सामना कर रही महिलाओं के पुनर्वास के लिए कार्यक्रम चलाते हैं. समाजिक कुरीतियों का सामना कर रही महिलाओं के लिए काउंसलिंग की व्यवस्था है. उनके विकास के लिए ज़रूरी पहलूओं पर काम करते हैं. इसके अलावा स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार, साफ़-सफ़ाई पर भी काम करते हैं.”

गोरा

गोरा का नास्तिक केंद्र दुनिया में मशहूर

गोरा का नास्तिक केंद्र अंतरराष्ट्रीय भागीदारी वाला है. हर दो साल पर यहां जापान, जर्मनी जैसे दुनिया के दूसरे देशों से एक समूह आता है और गोरा के बताए सिद्धांतों को अपने अपने जीवन में उतारने की सीख लेकर वापस लौटता है. इसके अलावा केंद्र में बहस और चर्चाओं के लिए सेमिनार के आयोजन भी होते रहते हैं.

  • (वी शंकर बीबीसी से साभार)

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