Sunday 05 Dec 2021 0:27 AM

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सांस्कृतिक विरासतों का भंडार है मैथिली : कुलपति

सांस्कृतिक विरासतों का भंडार है मैथिली : कुलपति

दरभंगा। निज प्रतिनिधि

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय मैथिली विभाग की ओर से बुधवार को एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। उद्घाटन संबोधन में कुलपति प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि मैथिली सांस्कृतिक विरासतों का भंडार है। उन्होंने साहित्य में उल्लिखित तत्त्वों को मिथिलावासी के व्यवहार में भी देखने की बात कही। इस बाबत यह संवैधानिक गरिमा को अक्षुण्ण रखने में सक्षम है। सांस्कृतिक धरोहरों को संवारने के लिए, संजोये रखने के लिए मैथिली के साहित्यकारगण धन्यवाद के पात्र हैं। साहित्य कितना प्रेरणादायक होता है, उसका कौन-कौन शब्द अपने ध्वनि के माध्यम से किस प्रकार मानवीय संवेदनाओं को झंकृत करती है यह कहना असंभव है। साहित्य यदि समाज के व्यवहारों को निरखने में सक्षम न हो तो रचना व्यर्थ है। मुख्य अतिथि कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शशिनाथ झा ने अपने व्याख्यान में मैथिली प्रबंध-काव्य के ऐतिहासिक संदर्भों को रेखांकित किया। उन्होंने विद्यापति रचित कीर्तिलता एवं कीर्तिपताका के साथ मध्यकालीन मैथिली के कुछ नाटकों को भी प्रबंध काव्य माना। व्याख्यान के क्रम में उन्होंने प्रबंध-काव्य को एक कथा सूत्र में बंधा हुआ मानते हुए अठारहवीं शताब्दी के मनबोध रचित कृष्णजन्म, कवीश्वर चन्दा झा रचित मिथिलाभाषा रामायण, पं सीताराम झा रचित अम्बचरित साथ ही एकावली-परिणय, कीचक-वध, कृष्णचरित, रावण-वध जैसे अनेकों महाकाव्य में ध्वनि, शब्द, वर्णनशैली आदि का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया। विशिष्ट अतिथि प्रतिकुलपति प्रो. डॉली सिन्हा ने मैथिली को बहुत ही कर्णप्रिय एवं समृद्ध भाषा बताया। डॉ. सिन्हा ने असमी, बंगला लिपि की तरह ही मिथिलाक्षर का आरंभ ब्राह्मणी लिपि से माना। प्रतिकुलपति ने इस प्रकार के कार्यक्रम को प्राथमिकता देने की बात कही। विभाग के वरीय शिक्षक एवं पूर्व अध्यक्ष प्रो. रमण झा ने बीज भाषण प्रस्तुत किया। इस क्रम में उन्होंने मैथिली प्रबंध-काव्य के ऐतिहासिक विकास को रेखांकित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय मैथिली विभाग की अध्यक्ष-संकायाध्यक्ष प्रो. प्रीति झा ने मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए समस्त मिथिलावासी से अपनी भाषा का वृहत्तर प्रयोग अपने घरों से बाहर तक करने की अपील की। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ प्रीति कुमारी, शिवम पोद्दार, शिवम कुमार झा के स्वागत भगवती वंदना के बाद अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। अतिथियों का स्वागत मिथिला परम्परानुसार पुष्प-माल्य, चादर एवं पाग पहनाकर किया गया। कार्यक्रम का संचालन वरीय प्राचार्य प्रो. नारायण झा कर रहे थे। प्रो. दमन कुमार झा ने कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया। तकनीकी सत्र से पूर्व विभागीय शोधार्थियों को मुख्य एवं विशिष्ट अतिथि के हाथों प्रमाणपत्र प्रदान किया गया। प्रमाणपत्र प्राप्त करने वाले शोधार्थीयों में रौशन कुमार, सत्यनारायण प्रसाद यादव, विभा कुमारी, वन्दना कुमारी, अंकित कुमार चौधरी उपस्थित थे। दोपहर एक बजे से तकनीकी सत्र आरंभ हुआ जिसकी अध्यक्षता प्रो. अशोक कुमार मेहता ने की। डॉ. अरविंद सिंह झा, डॉ. अजित मिश्र, डॉ. अरुण कुमार ठाकुर, डॉ. अरविंद झा, डॉ. सुरेन्द्र भारद्वाज, प्रो. रागिनी रंजन, प्रो. अभिलाषा, डॉ. सत्येंद्र कुमार झा, प्रवीण कुमार झा, राजनाथ पंडित, सोनी कुमारी, विष्णु प्रसाद, विद्याचंद्र झा आदि ने तकनीकी सत्र में शोध आलेख का वाचन किया। अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. मेहता ने सभी सत्रों की संक्षिप्त समीक्षा की। तकनीकी सत्र के अंत में आगत सभी वाचन प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र समर्पित किया गया। इस सत्र का संचालन प्रो. दमन कुमार झा और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. रमेश झा ने किया। इस अवसर पर आरंभ से अंत तक प्रो. भीमनाथ झा, प्रो. एके बच्चन, डॉ. अशोक कुमार झा, प्रो. अरुणिमा सिंह, प्रो. रमेश झा, प्रो. उषा चौधरी, डॉ. वैद्यनाथ चौधरी 'वैजू' डॉ. सुनीता झा, गोपाल कुमार, डॉ. गोविन्द प्रसाद आदि उपस्थित रहे।

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